आखिर क्यूँ शांत हो गई मनुआ!!!!

कितनी चंचल हुआ करती थी
अब कितनी शांत हो गई है मनुआ !

कल तक तो अच्छी भली खेलती
कभी कभी मेरे घर के पिछूआरे तक
पहुँच कर ऊधम मचाती ,
खिलखिलाती , शरारतें करती थी
यह कोशी की उच्छृंखल बेटी॰
पर अब कितनी शांत हो गई है !

shantmanua

अप्रैल- मई की तपती दोपहरी मे
मॉर्निंग स्कूल से छूटे गाव के नटखट बच्चे
घंटों इस पार से उस पार तैरते रहते ,डुबकियाँ लगाते राहत;
अरहुल फूल सी लाल-लाल आँखें लिए घर पहुँचते
और हर रोज माँ या भैया से पिटते
पर अगले दिन फिर उसी मनुआ मे हेलने पहुँच जाते।
पहाड़ से नीचे उतरकर कुछ दूर माँ की उंगली पकड़ कर
बाबा पशुपति नाथ के चरण छूती
साथ चलकर अलग हो जाती है ,
खोज लेती है अपना अलग घर
अपने लिए एक नई दिशा।
हर साल अपने तट पर बसे दर्जनों गावों को उजाड़र्ती
अठखेलियाँ करती
पता नहीं किसकी याद मे रातों को बिरहा गुनगुनाती रहती हे
कल-कल ,कल कल
छल छल ,हर पल।
पर अब शांत श्लथ कैसे हो गई मनुआ !

यह कोलाहल कैसा ?
मृतयोपरांत नख –बाल की रस्म मे मनुआ नहाती ,
रोती बिलखती औरते
ये कैसा संगीत हे?
गाव की बूढ़ी जवान औरतें छोटे –छोटे
बरुआ बाबू का सिर मुड़ाकर
चौमासा, बरहमसा गाती, खिलखिलाती विधि सम्पन्न करती बालाएँ
या फिर छठ पर्व पर सुबह-शाम का अर्घ्यदान करती बूढ़ी माताए
पवित्र मनुआ मे घंटों खड़ी ठिठुरती ——-
उगा हो सुरूज़ देव ।
न जाने कितनी संस्कृतियों , संस्कारों की मूक गवाह रही हे मनुआ!
गाँव का हर दर्द , सहती
हर त्योहार मे शामिल होती रही मनुआ
आखिर सूख कैसे गई’
कैसे इतनी शांत और मौन हो गई
कोशी की यह लाड़ली बेटी !

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