आत्म ज्ञान

आत्म ज्ञान
रात्रि के अंतिम प्रहर मे
जब पूरी दुनिया गहरी नींद मे सो रही होती है
जब रतजगी के बाद मौलया चाँद
आकाश की बाहो मे सो जाने को आतुर होता है
और सारा तेज ताप हूँकार छिपाए
आदिम नैसर्गिक भूल की पोटली काँख मे दबाये
ईडेन गार्डेन के द्वार से झांक रहा होता है सूरज
भोर की प्रतीक्षा मे ;
मै
उसी आदिम भूल की एक संतान
काँटों की सुख- समृद्धि भरी सेज पर
या फिर दर्द के पालने मे झूलते हुए
हर पथिक से पूछता हूँ
अपनी मुक्ति का मार्ग
चिलचिलाती धूप मे
खौलते रेगिस्तानी समुद्र मे
नंगे पाँव दौड़ते हुए
मै खुद से जानना चाहता हूँ
अपना सच
आत्म-ज्ञान की घुट्टी पिलाने हेतु
मुझे अबतक नहीं मिला कोई कृष्ण या कोई गौतम बुद्ध
यूं ही जाड़े की गुनगुनी बादामी धूप मे
अलाव के पास बैठे
या फिर रिमझिम बरसात मे भीगते हुए
अपने सच की रोमांटिक माला पिडो रखी है
जाने क्यू अपने अतीत को
अपना सच मान रखा है
जब कि मै खुद जानता हूँ मेरा सच मेरा अतीत नहीं हो सकता

लंगड़ाती गलियों मे आज भी वही कीड़े बजबजाते है
उनकी दुर्गंध आज भी नाक मे है
( माफ कीजिये , यह कोई नोसतलजीया नहीं )
सच कहूँ तो मेरे सच की गली उस अंधे सुरंग से होकर जाती है जो चारो दिशाओं से बंद है
निपट एकांत और निर्जन’
जहां में अहर्निश बुनता रहता हूँ
सन्नाटा
और जोड़ता रहता हूँ अपने वर्तमान की यातनाओं को
अपने लंगराते अतीत और भविष्य से
इस आशा मे कि कहीं मुझे भी ज्ञान प्राप्त हो जाये ।
काही में भी अपनी पीड़ा , वेदना और सारी यातनाओ के सुरंग से निकालकर
आतमस्थ हो जाऊँ —– बिलकुल स्थितप्रज्ञ ।

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