जाने कहां गए वो दिन………….

(कक्काजी  स्व.  परमेश्वर  कुमर को याद करते  हुए)

आज  की गला –घोंट राजनीतिक प्रतिस्पर्धा के युग में परमेश्वर कुमर जो एक प्रखर स्वतन्त्रता सेनानी , चौहत्तर  आन्दोलन  के तपे –तपाये   अपनी  मिटटी  से  गहरे  जुड़े  जन-नेता थे, कुछ-कुछ अप्रासंगिक हो  गए थे . अप्रासंगिक इसलिए कि उन्होंने राजनीति अपने  करियर  के   लिए नहीं , लोक सेवा के  लिए की. अप्रासंगिक इसलिए कि उन्होंने कभी सिद्धांतों , उच्च नैतिक  मुल्यों से  कभी समझौता  नहीं किया.  अप्रासंगिक इसलिए  कि  समाजवाद , गांधी, लोहिया  और  जयप्रकाश उनके लिए  शो -पीस या  भाषण –कला प्रदर्शन  या लफ्फाजी  नहीं थी , बल्कि उन्होंने  इन बिभूतियों  के विचारों  को  आत्मसात कर लिया था और  उन्ही  मूल्यों को जीते  रहे.

यह  मैं सिर्फ  श्रद्धांजलि अर्पित करने के भाव से  नहीं कह  रहा बल्कि  उनको  नजदीक  से जानने वाला   हर राजनीतिक या गैर-राजीनीतिक आदमी इस बात की  तस्दीक  करेगा .     वजह थी ऊनकी स्वभावगत सरलता, राजनीतिक  निश्छलता  और आम आदमी  के  दर्द का  एहसास—अपने क्षेत्र के लोगों  से  उनकी  आत्मीयता. खासकर  कोशी पीड़ितों के  लिए  उनके  मन में  अपार  दर्द  था .अक्सर कुमारजी क्षेत्र  के  लोगों को उसके नाम  से  पुकारते   या फिर  उसके  बाप  के  नाम  से. “ हेरे फलम्मा के बेटा— बड काबिल बनि गेल  छह”. उनका यह अपनत्व भरा  संबोधन ही लोगों  को  भावनात्मक जुडाव का एहसास  करा  देता  था . यही कारण था  कि   महिषी विधान सभा क्षेत्र या फिर कहें ,कोशी  क्षेत्र  के लोग उन्हें ‘काकाजी’ कहा करते थे.       कुमरजी से मेरे संबंध शुरू में उतने  नजदीकी  नहीं थे —- महज एक पत्रकार और राजनीतिक नेता की  तरह  औप्चारिक .       लेकिन बहुत  शीघ्र ही उनके नजदीक  खींचता  ही चला  गया . बाद  के पांच-सात  वर्षों  में हम  इतने नजदीक  हो  गए  एक  दुसरे से  कि    कुमरजी में  अपने  पिता की  छवि दिखाई देने  लगी . वे अलस्सुबह मोर्निंग वाक् से लौटते हुए मेरे गौतम नगर (गंगजला ) स्थित आवास पहुच कर सड़क पैर  से  ही आवाज लगाते –——-“हो ,बशीकांत,घर में  छह ?बाहर  बैठकी में  पढ़ रहे  मेरे  बेटे  से पूछते —“हेरे बाप कहाँ  गेलो रे.” फिर  उनकी  किताबों  को पलटकर  कहते –“ बाप ते कुछ पढबे  नहि  केल्के आ ई चललाह हे विद्वान् बने . हेरे तोहर बाप  के  उपाय छोऊ हमरा चाय  पियेभी ? ” और फिर  चल पड़ती दुनिया – जहां की बाते.खुल पड़ते उनके  व्यक्तिगत  अनुभवों के  पिटारे .”

कुमरजी का   निश्छल  प्रेम और  सेवा  भाव का  असली  रूप दिखा था  वर्ष १९९७ में जब  में  आंत उलझने के कारण  गंभीर रूप से  बीमार होकर सहरसा सदर  अस्पताल में  दस दिन  तक भर्ती रहा .  कुमरजी नित्य सुबह  सात- आठ बजे तक होस्पिटल पहुँचते  और दस –ग्यारह बजे  तक  मेरे  सिरहाने एक कुरसी पर  बैठे रहते चुपचाप . सिर्फ  वार्ड में आये  डाक्टर से  कुछ  पूछते ओर फिर कुर्सी  पर  बैठ  जाते. एक दिन सुबह सवेरे हमारे डाक्टर साहेब के  नया बाज़ार स्थित  उनके  निजी  आवास  पर पहुँच  गए और  उनका नाम लेकर  इतना  जोर-जोर से  पुकारने  लगे  कि  लोग सब  बाहर  निकलकर  झाँकने  लगे . डाक्टर  साहेब के  निकलते  ही  काकाजी ने  अत्यंत   भावुक होकर  कहा, “ बडका  डाक्टर बनि  गेलाह. बशीकांत अस्पताल  में मरै छै आ  तू घर  में सूतल  छह ? उनकी  आँखें डबडबा गई थीं . उनकी  करुणा   व वात्सल्य का  अनुपम  उदाहरण  था. यह करुणा सिर्फ्फ़ मेरे  लिए  या  मेरे  जैसों  के  लिए ही  था, ऐसी  बात  नहीं.दोनों कोशी  तटबंधों के बीच  रहने वाले  बीमार  लाचार  लोगों  के  लिये किसी  अधिकारी  के  खिलाफ वे  हद  तक जा  सकते थे. एक दिन उन्होंने खुद  मुझसे  कहा था कैसे कोशी पीड़ितों के  लिए  आन्दोलन  के  क्रम  में वे राष्ट्रपति डाक्टर राजेन्द्र  प्रसाद  की  गाडी के  आगे  लेट कर  विरोध  प्रदर्शन किया  जिसके कारण  उन पर  देशद्रोह का  मुकदमा  चलाया गया.  बाद में  प्रथम  मुख्यमंत्री  डाक्टर श्रीकृष्ण सिंह के  हस्तक्षेप  पर सरकार  ने  मुकदमा वापस  लिया और  उन्हें  किसी तरह  मुक्ति  मिली ..

कुमरजी ने  जीवन –पर्यन्त कोंग्रेस – विरोधी राजनीति करते  रहे और कोशी  क्षेत्र में  एक  धुरी बने  रहे  पर  कांग्रेस  के बरिष्ट नेताओं जैसे राजेन्द्र मिश्र , ललित  बाबू,  अमरेन्द्र मिश्र,  जटा  शंकर  चौधरी आदि  के  प्रति  उनकी  गहरी  आस्था  और आदर  भाव  था. इतना ही  नहीं , अपने  चिर- विरोधी कांग्रेस के दिग्गज नेता,  लह्टन   चौधरी  के  लिए  उनके  मन  में  अपार  श्रद्धा थी.  एक  घटना  का  मै  खुद  गवाह  हूँ. कोशी-पीड़ितों  के  लिए  एक एक जन संगठन द्वारा  चलाये  गए   आन्दोलन  के क्रम  में एक  सहभोज  का  कार्यक्रम  था .मैं भी आमंत्रित था . संयोग  ही कहिये ,  मेरे एक  बगल  लहटन  चौधरी बैठे  थे और दूसरी तरफ परमेश्वर  कुमर . दोनों के  बीच  राजनीतिक  प्रतिस्पर्धा  चरम  पर थी.  आजादी के  बाद हर  चुनाव  में  महिषी विधान  सभा  क्षेत्र से  कांग्रेस  के  उम्मीदवार  चौधरीजी  होते  थे  और   विरोधी पार्टी (समाजवादी ) से कुमरजी.  इन दो  दिग्गजों के बीच हार-जीत  की  आँख –मिचौली होते  रहती थी. मुझे लगता  कि  यहाँ  भोज  में  भी  किसी  बात पर  दोनों  भिड जायेंगे.  लेकिन  मेरी  आशंका  निर्मूल  साबित हुई .  कुमरजी ने अचानक प्रसंग  छेड़  दिया — “ जानते  हो  बशीकांत ,  चौधरीजी  इतने कजूस  हैं कि  अपने  से  छोटों को आशीर्वाद  देने  में भी  कोताही  करते थे. चौधरीजी ने  टोका— इस्ससे  पूछिए  न , यह  कितना  धूर्त  और  चालाक है. दोनों  की  आपसी  भिदंत्का  लब्बो-लुबाव  यह  था कि  कुमारजी चुनाव  का  नामांकन कर्ण  के  लिए  जाते  समय  चौधरीजी का  आशीर्वाद लेने  जिला  कांग्रेस  ऑफिस पहुँच जाते  और  चौधरीजी  के  चरण  स्पर्श कर  कहते – आशीर्वाद दियौ हम  चुनाव  जीत  जाई .  चौधरीजी  दुविधा  में  पड़  जाते क्योंकि कुमारजी  की  जीत  का  स्पष्ट मतलब था  चौधरीजी  की  हार. भश्मासुर  के  कहानी हर  चुनाव में  दुहराई  जाती थी . चौधरीजी  भी  तो  कम  होशियार  नहीं थे. सो  कुमरजी  के  माथे  पर  हाथ  रखकर  कहते –“ भगवान् तुम्हे सद्बुद्धि  दें. चिरायु  भव.” एक  और  मर्मस्पर्शी घटना  का जिक्र करना समीचीन  होगा. वर्ष  १९९०  के आम चुनाव में कांग्रेस पार्टी की करारी हार हुई और बिहार  में लालू  प्रसाद  के  नेतृत्वा  में  सरकार  गठन किया  गया.  कांग्रेसके उम्मदीवार  तो चौधरीजी ही थे (और वे बुरी तरह  हार  गए थे ) परन्तु  उनके  खिलाफ  कुमरजी  नही  थे . बहरहाल लहटन  चौधरी  १९९१ में  कोशी  बाढ़ का  सर्वेक्षण कर लौटे थे.   सहरसा  पीडब्लूडी निरीक्षण भवन  में प्रेस कोंफेरेंस आयोजित की गई थी .  प्रेस कांफ्रेंस के पश्चात   कोंग्रेस  कार्यकर्ता  आपस  में कानाफूसी कर रहे थे जिसमे  कोई कह  रहा  था  कि  परमेश्वर  कुमर को केंसर हो गया  है . वे  पी ऍम सी एच  में भर्ती हैं. लहटन  चौधरी  के  कानों में बात  जाते  ही  उन्होंने  जिस  तरह  प्रतिक्रया व्यक्त की  वह  आज  भी  मेरे  जेहन  में कौंध  जाती  है . चौधरीजी  का चेहरा  तमतमा   आया  था.एक झटके  में सोफे से उठते हुए वे चिल्ला उठे—-“नो नो, नो, कुमर ने कभी  कोई पाप नहीं किया है . उसे  केंसर  नहीं  हो सकता .” चौधरीजी  की  आँखों में भर आये आंसू की बूंदे किसी से छिप नहीं सकी.

एक  विरोधी  की  आँखों में  यह करुना  देखकर  मै स्तब्ध रह  गया.

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