सामा-चकेवा

सामा-चकेवा

दीवाली  और  छठ पर्व  के  साथ  ही  एक  और  अति- विशिष्ट  पर्व का  मैं  बेसब्री  से  इंतज़ार  करने लगता  हूँ  जिसे  हमलोग  सामा –  चकेवा के नाम से जानते  हैं . भाई –बहन  के प्रेम से सराबोर  यह पर्व  जहां  एक  ओर  मिथिलांचल की   समृद्ध  और उदार लोक- संस्कृति  का एहसास  कराता  है ,वहीँ  दूसरी  तरफ  इस अवसर  पर  गाये  जाने वाले गीतों की  अनुगूँज से   एक मीठा सा  अवसाद  मन  पर  छा  जाता  है और  खुद  पर  अपनी जड़ से उखड़े होने  की  रिक्तता छा जाती है —– एक  ‘नोस्टाल्जिया’ –सी होने लगती है  जिसे  आधुनिक अंग्रेजी साहित्य  में  डायस्पोरा  कहा  जाता  है. हम  सभी  तथा-कथित  पढ़े – लिखे  लोग  मैथिल- डायस्पोरा  ही  तो  हैं  जिन्हें ऐसे  अवसरों पर  अपने गाँव की  गलियाँ ,सड़कें ,पर्व  त्योहारों  की  सुरीली तान  याद  आती  तो हैं ,परन्तु  सिर्फ  एक  कसक पैदा करने के लिए —- काश , वो दिन  फिर लौट  आते ! लेकिन  गुजरा वक्त  भी कही लौट  सकता  है?

किंवदंतियों  के अनुसार  सामा- चकेवा  पर्व  की सामा  कृष्णा  की  अभिशप्त  बेटी  है   जिसे  स्वजनों  की  चुगली अर्थात  झूठी शिकायत का शिकार  बनना  पड़ता  है. कहते हैं कि  चुगला ने  सामा  पर  किसी गलत  काम का झूठा  आरोप  लगाते हुए  कृष्ण से  शिकायत की थी जिस  पर  कृष्ण के श्राप से वह एक  चिड़िया में रूपान्तरित  हो गयी .सामा  का  भाई  चकेवा को इसकी  सूचना  मिली तो वह बहुत  दुखी  हुआ और इसके विरूध्द  उसने  घोर  तपस्या  की . भाई  कि  तपस्या  से   सामा  श्राप –मुक्त  होकर पुनः अपने पुराने  मानव  शरीर  में  लौट आती है.

इस कथा  की पुष्टि  के  लिए  मेरे  पास किंवदंतियों  के सिवा कोई और प्रमाण  नहीं  हैं ,लेकिन  जानकारों  का दावा  है  कि पुराणों में इसकी  विस्तृत  चर्चा  है. इस पर्व  को  लेकर मेरे  मन में कुछ जिज्ञासाये  बचपन से बनी  हुई  हैं  जिसे  आज  आपसे  शेयर  करना  चाहता  हूँ.

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सामा – चकेवा  पर्व मुख्यतः  मिथिलांचल तक  सीमित है. किसी दुसरे  रूप में भी किसी  दुसरे   क्षेत्र में इस  पर्व के मनाये जाने  कि  भी  कोई  सूचना  मुझे  नहीं  है.

क्या मथुरा और द्वारिका  के  कृष्ण की  कोई बेटी  थी जिसका  मिथिलांचल से  रिश्ता  था? या  फिर कोई  दुसरे  कृष्ण की कथा है  जिसका निवास  मिथिला क्षेत्र  में  पड़ता  हो? इसकी  संभावना तो कम ही  है  क्योकि  ऐसी कोई  चर्चा  मिथिला  के  इतिहास में नहीं  मिलती. तो  फिर  ऐसा  कैसे  हुआ कि श्रीकृष्ण  की  बेटी  की  कथा  मथुरा –वृन्दावन से  सीधे  मिथिला  पहुँच  गई  और यहाँ  के  जनमानस  में इस कदर पैठ  गई ?और  तुक्का  यह  कि  मथुरा  वृन्दावन  के  बीच  के  बड़े भूखंड  में इसकी  छाया  तक नहीं पड़ी !  बहरहाल , मिथिला  की   इस  सांस्कृतिक  उदारता  और  संग्राह्यता  को सलाम  ही  किया  जा  सकता है. यही  हमारी  विरासत  है ,  यही  हमारी  विशिष्ट पहचान   है.

इस  पर्व  पर  मैथिल  ललनाए मिटटी  की  मूर्तियाँ बनाकर  उन्हें  सांकेतिक  नाम  देती  हे जैसे— सामा , चकेवा, चुगला,वृन्दावन , सत्भैयाँ  आदि .छत  के  खरना  के  दिन  से  यह  प्रारम्भ     होता  है .मिटटी  कि मूरतों  को  बड़े  मनोयोग  से  बनाकर  उन्हें  सुखाया  जाता  है  .पहले उन्हें पिठार से उजले रंग में रंगा जाता हैं उसपर काला लाल आदि रंगों से उनके नाक कान होंठ बनाये जाते हैं.विडंबना यह हैं कि इतने प्यार से बनाई गई मुर्तिया कार्तिक पूर्णिमा कि रात भाइयों के समक्ष प्रस्तुत की जाती हैं जो उन्हें दो टुकड़ो में फोड़ देते हैं. फिर बहने उन्हें एक डाला में सजाके गाँव के बाहर जोते हुए खेत में विसर्जित कर देती हैं.समुह में जाती हुई बहनों का झुण्ड बड़ा ही मनोरम दिखता हैं और उतनी ही माधुर्य से समदओंन गाकर पारंपरिक रूप से विदा करती हैं जैसे मिथिलांचल में बेटियों को विदा करने कि परम्परा हैं.चुगला और वृंदावन कि मूर्तियाँ जलाके बहने ख़ुशी से नाचती और गाती हैं.सामा को विदा किया जाता हैं इस अनुरोध के साथ कि अगले साल वो फिर लौट कर आवे.

इतिहास  की   नीरस  गलियों  से  निकलकर  झांकें तो मिथिला लोक-संगीत  की  एक  विशिष्ट मिठास  सुनायी  पड़ती  है   जो अन्यत्र  दुर्लभ है.                        signature1

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