खिड़की के उस पार

                                                          खिड़की के उस पार

chand

 

मुझे दिन के उजाले से अधिक

रात के अँधेयारे रास आने लगे हैं

अब बादलों में ढका चाँद

चाँदनी की औपचारिक रोशनी से अधिक भाने लगा हैं

अपने बिस्तर में लेटा लेटा

खिड़की के उस पार

चाँद से आँख मिचोली खेलता हूँ

जो कभी

हँसता हैं मुझपे

कभी रोता हैं मेरे साथ

कभी उलाहने उपालाम्भो से

कर देता हैं सराबोर:

कुछ अपनी बदसूरती की दास्ताँ कहते कहते

कहीं किसी लैंप-पोस्ट या चारमीनार कि उचाईयों में छिप जाता हैं

जहाँ

क़ैद हैं मेरे सारे सपने

मेरे बीते दिनों के खट्टे-मीठे एहसास

और

वह मेरी असफ़लता बनकर मेरी आँखों में

आँख गराए रहता हैं.

बिस्तर में लेटे लेटे

मुझे कभी चाँद का

बदसूरत चेहरा नज़र आता हैं तो

कभी अपने गाँव की उग्रतारा

जो

ना जाने क्यूँ

मुझसे रूठी रहती हैं इनदिनों

घर के आँगन में

तुलसी चौरा पर

मेरी माँ नित्य दीये जलाती हैं

लेकिन माँ का दीप-दान

ग्रामदेवी तक पहूँच नहीं पाता हैं शायद

मैं सोच नहीं पाता

आखिर

क्या हैं मेरा वर्तमान

जो

अतीत कि लाठी पे टिक-टिक चलता रहता हैं

और

आमन्त्रित करता हैं

मेरे लंगड़े भविष्य को

जो

बादलों में डूबते उतराते चाँद कि

काली पट्टी में समां जाता हैं

निर्विकल्प

निह्सस्त्र

निराधार.!!!!

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