राजकमल को याद करते हुए

राजकमल  को  याद  करते  हुए ……….

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१९६७  में हुई असमय  मृत्यु के  बाद  राजकमल विरोधाभासों  के  शिकार  बने रहे .आलोचना की  दो  अतिवादी  प्रवृत्तियाँ  उनके  आस-पास  मंडराती  रहीं .एक  वर्ग  उन्हें चिर- विद्रोही ,आवारा  मसीहा  घोषित  और  सिद्ध करने में  लगा  रहा  तो दूसरा  पक्ष  जो उनके जीवन काल से  ही उनका  विरोधी था , उन्हें शराबी, गंजेरी, अफीमची, औरतखोर  अश्लील  और  “साहित्य का  सबसे  बड़ा  कोर्रुप्टर (greatest  corruptor in  literature) बताता  रहा.  लेकिन  मैं  जब  गाँव के  हाय स्कूल  का एक  छात्र था  और   हर  वर्ष तेरह  दिसंबर  को  आयोजित  होने  वाले राजकमल  जयंती समारोहों   का  भागीदार  हुआ करता करता  था ,तब से  मुझे  स्पष्टा  लगता  रहा  कि  ये  दोनों  तरह  के  परस्पर  विरोधी  विचार  या  अभियान  साहित्य  के  लिए  सर्वथा  अस्वास्थ्यकर  ही  नहीं  अवांछनीय  भी  हैं.  कहीं –कहीं  यह  भी  कहा  गया कि  अश्लीलता  राजकमल  के  जीवन  या  साहित्य  में नहीं ,आलोचकों  की  आँखों  में है.

इस तरह  के तर्कों का  आधार  सामान्यतः  राजकमल की  हिंदी  एवं  मैथिली की  कथा, कहानिया  एवं  उपन्यास  साहित्य  है  जिनमे  “मै “  या  फिर  कमल  बाबू  एक प्रोतागोनिस्ट (protagonist) के  रूप  में  नजर  आते हैं.  कविताओं  में  उनकी  स्वीकारोक्ति या  खुले  संघर्ष  का  आख्यान उनके  व्यक्तिगत  जीवन  से  जोड़कर देखा  गया. और  यही  था  उनका  माया जाल  जिसे  वह  जान-बूझ  कर  बनाए  रखना  चाहते  थे.  अपने  इर्द-गिर्द  मिथकों  का  जाल  बुनते  रहना  उनकी  आदत  सी  थी  या  फिर  शिल्पगत  और  कथ्यगत आवश्यकता .  लेकिन  हमें  यह  नहीं भूलना  चाहिए  के  राकमल  अपने  समय के  सबसे  पढ़ाकू  रचनाकारों  में से  थे.जिसकी  एक  झलक   “मछली  मरी  हुई “  में  मिलती  है.  टी एस  इलियट , इज़रा पाउंड  आदि  पाश्चात्य  रचनाकारों ,  आलोचकों  को ना केवल  पढ़ा  था  बल्कि आत्मसात  कर लिया  था.  इलियट  का  आलोचना  सिद्धांत खासकर  ऑब्जेक्टिव कोरिलेटिव   का  उन्हें  स्मरण  था. इलिअत  का  मूल सिद्धांत  था—-“The  man  who  suffers  is  different  from  the  man  who  creates. भोक्ता  और  साहित्य  सर्जक  भिन्न-भिन्न  व्यक्ति  होते  हैं. उनकी कविताओं  से  गुजरते  हुए  इलिअत के  हिस्टोरिकल  सेंस  के  दर्शन  स्वाभाविक रूप  में  हो  ज़ाते  हैं.

उनके जीवन के अन्तिम  महज डेढ़ दो वर्षों तक मुझे राजकमल के  सान्निध्य का अवसर  मिल सका. वह भी  तब  जब मैं किशोरवय होने के कारण बिल्कुल फॉरमेटिव  स्टेज (formative  stage) में था. उम्र में काफी छोटा होने के बावजूद मुझे फूलबाबू(अर्थात राजकमल चौधरी) बशी काका ही कहा करते थे परन्तु मैं उनके व्यकित्त्व  से इतना भयभीत रहा करता था कि उनसे बात करने की  हिम्मत नही होती थी.वे भी कभी कभार ही कुछ कह दिया करते थे. अपने  पुश्तैनी  घर से निकल कर अपनी  निर्माणाधीन कुटिया तक जाने के लिए  वे अक्सर मेरे आँगन होकर शोर्टकट रास्ते से   गुजरते थे. गुजरते समय परिवार की  औरतों को सावधान करने के लिए(ताकि वो पर्दे में चली जायें) वे मेरी मां को ‘बाबी’ कहकर  आवाज दिया करते  थे या फिर अंगने में मुझे पढता देख कर कहते, “ बशी काका पढ़इ छी ?,पढू , खुब पढु” . पारिवारिक शालीनता और मर्यादा की  ऐसी मिसाल मैंने कम देखी हैं.

यह सच हैं कि अपने पिता से उनका बहुत लगाव नहीं था, या यह भी कह सकते हैं कोई  प्रगाढ़ स्नेह संबंध नहीं  रहा .लेकिन  मैंने उन्हें कभी मर्यादा तोड़ते हुए या ऐसा कुछ कहते-करते हुए नहीं  देखा जिसे सामाजिक मान्यताओं या पिता पुत्र की  लक्ष्मण रेखा पार करने  की संज्ञा  दी जाए .एक रात की घटना मेरे  जेहन  में अब भी  बरकरार  हैं. जाड़े की   रात थी , लगभग रात के दस बजे थे . अचानक फूल बाबू और उनके पिता (अर्थात मेरे लाल भाई ,स्वर्गीय पंडित मधुसुदन चौधरी) के बीच ज़ोरदार बहस हो रही थी.दोनों एक दुसरे पर चिल्ला रहे थे.हमलोग दरवाजे तक  दौड़  कर गए तो वहां देखा कि वातावरण बहुत गर्म  है. लगा कि आज बात कुछ बढ़ जाएगी. परन्तु यह क्या! दोनों एक दुसरे पर वेद  उपनिषद नहीं पढ़े होने का आरोप लगा रहे थे. लाल भाई कह रहे थे, “ फूल बाबू नहीं पढ़ल अछि त वेदक अध्ययन करू”. ज़वाब में फूल बाबू कहते “हमरा वेद  सब पढ़ल अछि” और वेद   की  कई ऋचाओं  का उद्धरण  पेश  करते. बात बहस तक सिमट कर रह जाती जिसे हमलोग  भीषण  झगरा समझते थे .  महज़ शास्त्रीय बहस हुआ करती थी. पिता से कितना भी विरोध क्यों ना हो उन्हें अपनी सौतेली माँ से कभी ऊँचे स्वर में बात करते नहीं सुना था. और  ना अपने चार  सौतेले भाइयों के  लिए कोई दुर्भाव. कई बार तो मैंने देखा कि उनकी विमाता आँगन में जोर जोर से बोल रही थी लेकिन फूल बाबू बिना कोई ज़वाब दिए  आँगन से बाहर निकल गए. हमारी समझ में यह बात आजतक नहीं आई कि  फूल बाबू  के पारिवारिक  संदर्भ  में यत्र तत्र मनगढंत बाते कहाँ से आ गई.साहित्य में किसी औरत का युवा उम्र  में  विधवा हो जाना  और समाज  के धनवान ,प्रतिष्ठित  लोगों की  गिद्ध दृष्टि पड़ना  आम  बात  है.   यह  तो स्वीकारना ही  होगा  कि  तत्कालीन  मैथिल समाज में बहु-विवाह , बाल  विवाह और  विधवा  उत्पीडन  जैसी  समस्याएँ आम थीं . और साहित्यकार  होने  के  नाते  समाज  की इस  नग्नता को  नग्न  रूप  में  ही  पडोसना उनका  धर्म था. यह  अलग  बात  है   कि  इस नंगेपन  को पडोसने  की  उनमे  पुरजोर  हिम्मत  थी  जो  उनके  अधिकाँश  समकालीन  लेखकों  में   नहीं थी.  शायद   येही  बेवाकी  लोगों की  नजरों में खटकती  थी.   परन्तु  व्यक्तिगत  जीवन  में  मर्यादा  का पालन करने  वाले फूल बाबू ऐसी बातोँ की  कल्पना भी नहीं कर सकते थे. यही  कारण  था  कि  सदा  यायावर रहे  फूल  बाबू  के  दाम्पत्य  जीवन  में  कभी  भी  कोई  खटास  नहीं  आयी .

मैंने व्यक्तिगत रूप से फूल बाबू को  सामाजिक और  सरकारी  भ्रष्टाचार  के खिलाफ संघर्ष  करते हुए देखा. एक दिन गाँव की  एक बूढी औरत माथे पर गेहू की  एक पोटली लिए आ रही थी और गाँव के जन वितरण प्रणाली के डीलर को गली देते, रोते-कलपते  जा  रही  थी .   फूल बाबू ने  देखा  तो उसे  बुलाकर  पूछा.पूछने पर बूढी औरत ने जो बताया उससे फूल बाबू का खून खौलने लगा क्यूँकि  औरत को उसके हक़ से बहुत कम अनाज दिया गया था.तैश में आकर फूल बाबू ने संबधित डीलर की  दूकान में ताला जर दिया और चाभी लेकर चले आये. घटना की  शिकायत बी डी ओ  साहब तक पहुंची,परन्तु बीडीओ  साहब जो अपने ज़माने के बड़े कड़क  पदाधिकारी मने जाते थे, की भी हिम्मत नहीं हुई फूल बाबू से इस संबंध में बात करने की. अंततः गाँव के ही कुछ प्रतिष्टित  लोगो ने बीच बचाव कर मामले को शांत किया. डीलर को चेतावनी दी गई जिसका उसने फूल बाबू के  रहते सदा पालन ही किया. गाँव की  गरीब लाचार औरतो का हक़ छीनना किसी डीलर के लिए आफत जैसा था.यहीबाट  सरकारी अधिकारियों  पर  भी  लागू  होता था.

यादें कुछ धुंधली सी है. लेकिन धुंए के उस पार  भी गड्ड -मड्ड चेहरों के  बीच फूल बाबू का  वह रौद्र रूप  मुझे कभी विस्मरण नहीं हो सकता.  आम चुनाव के  दिन थे. कोंग्रेस विरोधी हवा चल रही थी. .कांग्रेस के एक शीर्षस्थ नेता महिषी गाँव में चुनाव प्रचार हेतु आ रहे थे.फूल बाबू को एक  दिन पहले पता चल चूका था .अगले दिन  गाँव में एक विशाल जुलुस निकला जिसका नेतृत्व स्वयं फूल बाबू कर रहे थे. एक बैल गाड़ी पर माइक से एक युवक नारे बोलता और बाकि लोग पीछे से सुर मिलाते.बीच बीच में फूल बाबू माइक लेकर सक्क्षिप्त भाषण   देकर कथित  कांग्रेस नेता के आगमन का विरोध करते रहे. गाँव की गलियों से गुजरता हुआ यह जुलुस पुनः फूल बाबू की  निर्माणाधीन कुटिया तक आकर विसर्जित हो गई ,परन्तु अचानक एक तनाव का वातावरण बन गया. गाँव के  कुछ बुजुर्ग जिनमे फूल बाबू के बड़े चाचा भी थे सामने के दलान पर बैठ कर गुफ्तगू  कर रहे थे. उक्त कांग्रेस नेता गाँव क एक बड़े परिवार  के निकट सम्बन्धी भी थे . सो उनका विरोध प्रकारांतर से गाँव क उस परिवार का भी विरोध था.धीरे धीरे बात फूल बाबू तक पहुंची. तमतमाए हुए फूल बाबू ने माइक  हाथ में लेकर बोलना शुरू किया , “ हम अपन काकाजी एवं गामक अन्य बुजुर्ग लोकनि  सं विनम्र निवेदन कर’ चाहै  छी जे आदरणीय नेता जी जों  मात्र गामक कुटुंब भ क अबै छैथ तं छप्पन प्रकारक भोग सं हुनक स्वागत करबन . मुदा जों औ कांग्रेस पार्टीक नेताक रूप में राजनितिक बात कर’ औता तं हुनका लेल विरोधक अतिरिक्त और कोनो बात नै भ सकैत अछि .हम किन्नहु हुनका अपन गामक सीमा में प्रवेश कर’ नहीं देवेन. “

बाद में सुचना मिली की उक्त नेता जी सहरसा हवाई अड्डे पर उतर कर गाड़ी में बैठने की  तैयारी में थे परन्तु फूल बाबू के विरोध-जुलूस की  सुचना पाकर तत्काल वापस दिल्ली लौट गए. इस घटना के तुरंत बाद फूल बाबू फिर बीमार पड़े और फिर उन्हें पटना जाना पड़ा. लगभग एक महीने बाद वे फिर वापस गाँव आये .इसी  बीच उक्त नेताजी का सफल कार्यक्रम महिषी में आयोजित किया गया.मज़े की  बात यह  है कि  नेताजी का स्वागत गान मैंने ही अपने एक ग्रामीण  मित्र के साथ गाया था.यह खबर फूल बाबू तक भी पहुँच गई थी. एक दिन सुबह सवेरे वे अपने घर से मेरे आँगन होते हुए अपनी कुटिया तक जा रहे थे. मुझे देखा तो रुक गए. पूछा ,” वशी काका ,नेताजी बाद में  गाँम आयल  छलाह?.हुनकर सभो भेल छलनि ! मैं  चुप चाप खड़ा हो गया और नीचे की  ओर देखने लगा. शर्मिंदगी में कुछ बोल नहीं पा रहा था.फिर उन्होंने ही बात पूरी की,”हाँ ई तं हमरा बूझल  छल जे नेताजी हमर अनुपस्थिति में  गाम अवस्य ओउताह .परन्तु ई नहिं  बूझल छल जे हुनक स्वागत गीत हमरे वशीकाका  के गाव’ पड़तानि . चलू कोनो बात नहिं . पढू !

………….!बस और वो चले गए.  फिर कभी  वापस नही  लौटने के  लिए . वही  बीमारी ,   वही पीऍमसीएच का  राजेंद्र सर्जिकल ब्लाक और……….  सदा  वक्त के आगे चलने वाले साहित्यकार  का   महाप्रयाण…………….. आवश्यकता  इस  बात  की है  कि  राजकमल  चौधरी  की  रचनाओं का  अध्ययन  सब्जेक्टिव  पूर्वाग्रहों  से  अलग  होकर  एक  वस्तुनिष्ठ आलोद्चना  प्रारम्भ  की  जाए.  यही  हिंदी  और  मैथिलि  साहित्य  के  लिए  स्वास्थ्यकर  होगा …..  फूल  बाबू को  एक  सच्ची  श्रद्धांजलि  भी.

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