अशोक का जन्मदिन

बिहार  सरकार  द्वारा हाल  ही में सम्राट अशोक  के जन्म दिन  पर  राज्य में सार्वजनिक छुट्टी  घोषित  किये  जाने  के  निर्णय का  स्वागत  किया  जाना  चाहिए . सम्राट  अशोक  की  वीरता , उनके  शौर्य और  पराक्रम तथा अखंड भारत  के  निर्माण  में उनका योगदान  असंदिग्ध है. पर negotiable  instrument  act   के  तहत  इस  छुट्टी  की  घोषणा  से  कई  विवादास्पद  प्रश्न  उठ गए  हैं  जिनका  समीचीन  उत्तर राज्य  सरकार और  इसके  मुखिया  श्री  नितीश  कुमार  से  अपेक्षित  है.

पहला  प्रश्न  अशोक  के  जन्मा-तिथि निर्धारण  से  है . आखिर  किस आधार  पर  उनका जन्मा  दिन  १४ अप्रैल  निर्धारित  किया गया जबकि इतिहास इस  पर  पूर्णतः  मौन  है. रोमिला  थापर , डी  एन  झा  जैसे  कई  इतिहासकारों  ने इस तिथि  निर्धारण  पर  एतराज  व्यक्त  किया  है  और  non historians  द्वारा  history  create जाने  की  प्रवृत्ति को ऐतिहासिक  भूल  बताया  है. आने  वाले  १४ अप्रैल  २०१६   को बिहार  सरकार  के  सभी  दफ्तर , स्कूल –कोलेज  बंद  रहेंगे . स्कूलों और  कोलेजों  में आयोजित  भाषणों  में  बच्चे  और  अध्यापक   शान  से  सम्राट अशोक   का  कीर्ति  गान  करेंगे  और  दावा करेंगे कि अशोक  का  जन्म १४ अप्रैल  को  हुआ  था .लेकिन  इसके  बाद वर्ष क्या  बतावेंगे ? सिर्फ ईसा पूर्व  अमुक  सदी  बता कर चुप  हो  जाना  यथेष्ट  होगा? बच्चों को गलत  ज्ञान  देकर   कितना  लाभ होगा?  क्या उनकी गलत  जानकारी  उनके भविष्य  के  लिए घातक  तो  नहीं  सिद्ध  होगी?

यूँ इसके  लिए  भाजपा-नीत एन डी ए  सरकार  के  कुछ  मंत्री  भी  इसके  लिए  कम  जिम्मेदार  नहीं जिन्होंने सम्राट अशोक का काल्पनिक चित्र  प्रस्तुत  कर  उसे  एक  जाति या समाज   विशेष  का  गौरव  घोषित  कर  दिया ! महापुरुषों  को  जातीय  संकीर्णता  में  बाँधने  की  प्रवृत्ति   से  अब  तो  तौबा करें. वैसे   ही   राष्ट्र नायकों  की  जयंती   या  पुण्य-तिथि  में अक्सर ऐसी बातें देखने  को मिल जाती  है  जिससे ग्लानि   उत्पन्न  होती  है.

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