मैंने सागर की लहरों पर ,सूरज को मचलते देखा हैं…

 

 

मैंने सागर की लहरों पर

सूरज को मचलते देखा है

नभ आँगन  कि  देहरी  पर

तारो को शरमाते देखा है

मैंने सागर की लहरों पर , सूरज को मचलते देखा हैं…

भुला-बिसरा बादल भी

यदा कदा आ जाता हैं

सुनी सुनी इन गलियों में जब

चाँद अकेला छा जाता हैं,तब

सूरज के ठंडे बिस्तर पर

सिलवट को गर्माते देखा हैं.

मैंने सागर की लहरों पर , सूरज को मचलते देखा हैं…

बरसों से उलझे मकरजाल में

यादों की बारिश होती हैं.

घनर घनर बदरा गरजे जब

कोयल बिरहा गाती हैं

तब इन अँधेरी सड़को पर

कुत्तों को भौंकते देखा है

मैंने सागर की लहरों पर , सूरज को मचलते देखा हैं…

 

 

 

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